वांछित मन्त्र चुनें

ते नो॑ भ॒द्रेण॒ शर्म॑णा यु॒ष्माकं॑ ना॒वा व॑सवः । अति॒ विश्वा॑नि दुरि॒ता पि॑पर्तन ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

te no bhadreṇa śarmaṇā yuṣmākaṁ nāvā vasavaḥ | ati viśvāni duritā pipartana ||

पद पाठ

ते । नः॒ । भ॒द्रेण । शर्म॑णा । यु॒ष्माक॑म् । ना॒वा । व॒स॒वः॒ । अति॑ । विश्वा॑नि । दुः॒ऽइ॒ता । पि॒प॒र्त॒न॒ ॥ ८.१८.१७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:18» मन्त्र:17 | अष्टक:6» अध्याय:1» वर्ग:28» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:3» मन्त्र:17


बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पुनः वही विषय आ रहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - (वसवः) हे धनस्वरूप ! यद्वा हे वासयिता विद्वानों ! (ते) वे सुप्रसिद्ध आप (भद्रेण) कल्याण और (शर्मणा) सुख के साथ (नः) हमको (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुरिता) पापों से (युष्माकम्) अपनी (नावा) नौका के द्वारा (अति+पिपर्तन) दूर पार उतार देवें ॥१७॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों के सङ्ग से कुकर्म में प्रवृत्ति नहीं होती है। अतः वे आदर से सेवनीय हैं ॥१७॥
बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे विद्वानो ! (ते, वसवः) वे पूर्वोक्त आप (युष्माकम्, नावा) अपनी ज्ञानरूप नौका द्वारा (नः) हमको (भद्रेण, शर्मणा) सुन्दर सुख से (विश्वानि, दुरिता) सकल दुःखसाध्य कर्मों से (अतिपिपर्तन) पार करें ॥१७॥
भावार्थभाषाः - हे वेदविद्या में पारग विद्वान् पुरुषो ! आप हमको अपनी ज्ञानरूप नौका द्वारा इस संसाररूप भवसागर से पार करें अर्थात् हमको सम्पूर्ण दुःखसाध्य कर्मों से पृथक् करके सुखसाध्य कर्मों में परिणत करें, जो विद्वानों का कर्तव्य है ॥१७॥
बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पुनस्तदेवानुवर्त्तते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे वसवः=वसुभूता धनस्वरूपाः। यद्वा। वासयितारो विद्वांसः। ते=यूयं सुप्रसिद्धा आचार्य्याः। भद्रेण=कल्याणेन। शर्मणा=सुखेन च सार्धम्। नोऽस्मान्। विश्वानि=सर्वाणि। दुरिता=दुरितानि=अनिष्टानि पापानि। युष्माकं नावा=नौसाधनेन। अति+पिपर्तन=पिपृत=अतिपारयत ॥१७॥
बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ते, वसवः) ते पूर्वोक्तविद्वांसः (युष्माकम्, नावा) स्वनावा ज्ञानरूपया (नः) अस्मान् (भद्रेण, शर्मणा) शोभनेन सुखेन (विश्वानि) सर्वाणि (दुरिता) दुरितानि (अतिपिपर्तन) अतिपारयत ॥१७॥